a message on ragging
ताबीज़
प्यारे बेटे !
आज तुम्हारे कॉलेज का दूसरा साल है
एक पत्र लिख कर
तुमहारी जेब में रख दिया हें
इसे 'ताबीज़' समझ कर
सदा अपने साथ रखना
पूरा एक साल बीत गया
जब तुम्हारा कॉलेज में
पहला दिन था
पर सीने में वो डर
आज भी ताज़ा है
अपनी पूरी गहराई के साथ
मेरे सीने का डर
ज़ब आँख से आंसू बन
बह पड़ता था
तब ज़माने ने देखा
तुमने भी
पर अपने पिता की जागती रातें
हर पल कहीं खोया मन
न तुम देख पाए थे
न ज़माना
-- पूरा एक साल बीत गया
ज़ब तुम अपने जीवन की
नयी शुरुआत करने चले थे
सबने कहा
बेटा बड़ा हो गया
पर हमें तुम
और भी छोटे होते लगे थे
जैसे अबोध बालक
भीड़ भरे मेले में अकेला हो
तुम जंग के मोर्चे पर भी जाते
तो मेरी आँखों में गर्व की चमक होती
पर ये कैसा मोर्चा था ज़िन्दगी का
जहाँ किसी अनजान भय से
मेरा रोम रोम सिहर उठता था
ये पहली बार था
ज़ब तुम
माँ का आँचल छोड़ रहे थे
पिता की मर्ज़ी के साये तले से
निकल रहे थे
आज भी मेरे सीने में ताज़ा है वो वेदना
ज़ब तुम किसी की कमी को
स्वयं पर ओढ़ बीमार पड़ गए थे
तुमने जाया कर दिया था
मेरी परवरिश को
हल्का कर दिया था
अपने पिता के खून को
कमी मेरी थी
मैंने अपने मखमली लाढ़ में
तुम्हे लौह पुरुष नहीं बनने दिया
कमी मेरी थी
मैंने तुम्हें स्वयं में
अटूट विश्वास करना नहीं सिखाया
कमी मेरी थी
मैं तुम्हारे विश्वास और सहारे का
अटूट संबल नहीं बन पाई
कमी मेरी थी
जो तुम्हें नहीं सिखा पाई
कि स्वयं से ज़बरदस्ती लड़ना
बहादुरी या समझदारी नहीं होती
कमी मेरी थी
जो तुम्हें नहीं सिखा पाई
कि तुम्हें अपने साथ हुए दूसरों के कूकृत्य
अपने दामन पर दाग नहीं
अलंकर बनाने हैं
कमी मेरी थी
कि मैं नहीं सिखा पाई
कि ज़िन्दगी की सहजता से बढकर
कोई सफलता नहीं
कि ज़िन्दगी की ख़ुशी से ऊँचा
कोई पद नहीं
मैं तुम्हें नहीं सिखा पाई
कि शिक्षा इसे नहीं कहते
जो जीवन की नैय्या को
बीच मंझधार में डुबो दे
पार न लगाना जाने
कमी मेरी थी
जो सदा तुम्हे जताया
कि मैं परेशानियों में
परेशान हो जाती हूँ
जभी तो तुम लड़ते रहे
स्वयं से अकेले
जैसे अनाथ हो
शर्मिंदा हूँ मैं स्वयं पर
शर्मिंदा हूँ कि तुम्हारे बिन कहे ही
सब कैसे न समझ पाई
शर्मिंदा हूँ कि हम समय रहते
कोई सीख नहीं लेते
जब तक कि स्वयं अपने ही सिर पर
न आन पड़े
नहीं समझा पाई तुम्हें
कि तुम्हारी ज़िन्दगी
और हर पल की ख़ुशी ही
मेरी ख़ुशी है
न बना पाई परिवार को ऐसा
कि हर छोटी से छोटी
और बड़ी से बड़ी
ख़ुशी और ग़म
सबको मिलकर बांटने हैं
नहीं समझा पाई
कि शराफत
सब चुपचाप सहते रहने में नहीं है
कि कभी उस राह से वापिस मुड़ना भी
समझ्धारी होती है
जिस राह पर चलने में
जीवन खो जाए
प्यारे बेटे !
जो सीख तुम्हें तब न दे सकी
वो आज देती हूँ
आज तुम्हारे कॉलेज का दूसरा साल है
अपने साथ हुए अनुभव से
सबक लेना --बदला नहीं
वरना किसी का बदला
तुम्हारे छोटे भाई
मिटठू पर भी उतरेगा
कोई तुमसे छोटा
जब तुम पर अकड़े
तो याद करना
मिटठू पर तुम्हारा सिर चढ़ा लाढ़
उसकी छोटी -छोटी दबंगई पर
शान से उसकी पीठ ठोंकना
याद करना पड़ोस की आंटी का
भयानक सूना आँगन
वो आँसुओं से खाली हुई आँखे
जाने कब किसी के 'हँसी मजाक' को
कोई भावुक मासूम मन
दूर अकेला अनाथ बैठा मन
किसी के बहुत लाढ़ो में पला लाढ़ चढ़ा मन
सहन न कर पाया और ..........
और आंटी की वो सूनी आँखें
तुम्हारी बेबसी और मिसमिसाहट
उसके ज़िम्मादारों के लिए
मन से निकली वो हिकारत
सबने कहा
कैसे घरों के होते हैं यह
कैसे होते हैं इनके माँ बाप
याद रखना
'हँसी मजाक' को
दागदार करने वाले 'ये'
दागदार करते हैं अपने माँ के दामन को
किसी की खुशियों को छीनने वाले ये
लुटाते हैं दोनों हाथों से
बाप की इज्ज़त को
औरों के वस्त्र उतारने वाले ये
अपनी नग्नता को
सरेआम ,घोषित कर रहे होते हैं
इन्हें बचाने वाले इनके 'माँ बाप'
'माँ बाप' नहीं होते ,
पर में तो एक माँ हूँ !
पर तुम्हारे तो एक पिता हैं
इसलिए कॉलेज के
पहले साल में आने वाले हरेक का
बाँहों में भरकर
स्वागत करना
करोगे ना !
---- एक माँ
अनिता भाटी
10/7/2011
copyrights are reserved if this touches your heart please gift this tabeez to your college going child or lovi'n ones
Thursday, 14 July 2011
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1 comments:
good
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