प्रवासी पंछी
सुना है प्रवासी पंछी
जल्दी ही लौट आते हैं
अपनी मिटटी में
हजारों कोस का सफ़र
मदमाते वसंत
उड़ान ऊँची ऊँची
रोकते जलतरंग
नित नए परिचय के
मन में बजते मृदंग
फिर भी लौट आतें हैं पंछी
अपनी मिटटी में
क्यूंकि वो पंछी हैं
वो उड़ते हैं नए शितिज पाने
कडकडाती शीत को
धुप की चादर उढाने
आँचल में समेटने
मोतिओं से दाने
उड़ जाते हैं वो
किसी ना किसी बहाने
फिर भी लौट आते हैं पंछी
अपनी मिट्टी में
क्यूंकि वो पंछी हैं
देखा हैं मनुष्य भी जाता है प्रवास पर
भाग जाता है अपने आप से
मिलते ही नयी डयोढी कोई
तोड़ देता हैं नाता अपने बाप से
भूल जाता है माँ के दुलार को
मिटा देता है उसके संसार को
देखा है मनुष्य फिर नहीं लौटता
अपनी मिटटी में
क्यूंकि वो मनुष्य है
मनुष्य स्वतन्त्र हो गया
कुदरत की मर्यादा से
अपरिचित होता गया
अपनी मिटटी की वफाओं से
अनगिनत पड़ावों पर ठहरता
बेमंजिल हुआ मनुष्य
चलता ही जाता है
देखा है मनुष्य फिर नहीं लौटता
अपनी मिटटी में
क्यूंकि वो मनुष्य है